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"अब चमन, अपना ठिकाना हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
दिल हमारा अब दिवाना हो गया है। फिर शुरू मिलना-मिलाना हो गया है।। [read more]
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एक और गणतंत्र दिवस
एक और गणतंत्र दिवस ऐसे  देश का  जहाँ गणना है प्रचुर  लेकिन गण है नगण्य [read more]
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१३. सूरज ने खोले नयन कोर
हट गया आवरण कोहरे का सूरज ने खोले नयन कोर [read more]
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"ज़िन्दग़ी में बड़े झमेले हैं" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
घर हमारे बने तबेले हैं ज़िन्दग़ी में बड़े झमेले हैं [read more]
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फिर कैसे अश्रुपूरित नेत्रों से स्वयं का दोहन करूँ?
नहीं हूँ मैं देशभक्त क्या करूँ देशभक्त बनकर जब रोज नए घोटाले करने हैं जब रोज जनता को  लूटना खसोटना है जब रोज भ्रष्टाचार के  नए नए मार्ग खोजने हैं जब रोज सच का गला घोंटना है जब रोज गणतंत्र के नाम पर सब्जबाग दिखाना है चेहरे पर ए ... [read more]
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१२. रे सूरज तू चलते रहना
रात अमा ने बाँधे घेरे निशितारों ने डाले डेरे उदयाचल के खोल झरोखे सूरज तू तो जलते रहना कलश ज्योत के भरते रहना [read more]
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गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
एक क़ता हाज़िर है- [read more]
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मेरा मन अब श्वेत है ...सब रंग लिए ...!!
षडज  का स्वर ... [read more]
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"आओ तिरंगा फहरायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
गणतन्त्रदिवस की शुभवेला में, आओ तिरंगा फहरायें। देशभक्ति के गीत प्रेम से, आओ मिल-जुलकर गायें।। [read more]
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मेरा अस्तित्व ...
लम्हा लम्हा तुम जलती रहीं कतरा कतरा मैं पिघलता रहा [read more]
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खामोश हवाओं की गतिविधियों से वाकिफ नहीं होते ऐसे लोग
शब्दों के डार्ट पन्नों के डार्टबोर्ड सबके पास होते हैं कोई डार्ट से सफलता के अंक लाता है कोई पन्नों को बेशक्ल फाड़ देता है ! पन्नों को फाड़कर किसी के अंक मिटाकर वह भ्रम की उड़ान भरता है ' मैं जीत गया ' पर वह खुद को कचरे वाले गड् ... [read more]
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अनायास ही उमड़ आतीं हैं क्यूँ - कुछ स्मृतियाँ
दोस्तों  [read more]
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११. सर्द मौसम की कहानी
सर्द रातों में लिखी है अथक श्रम की नव कहानी कृषक राजा कह रहा है सुन रही है अवनि रानी सर्द मौसम की कहानी [read more]
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रहिमन वे नर मर चुके...
स्मृति शिखर से... 4: [read more]
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खामोश जिंदगी
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"अब बसन्त आयेगा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
खिल जायेंगे नव सुमन, उपवन मुस्कायेगा!! [read more]
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रंगीनियों का शहर "पेरिस"
फ़्रांस की राजधानी पेरिस - द सिटी ऑफ़ लव, भव्यता, संम्पन्नता, ग्लेमर का पथप्रदर्शक.बाकी दुनिया से अलग एक शहर, जिसकी चकाचौंध के आगे सब कुछ फीका लगता है. लन्दन आने वाले हर व्यक्ति के  मन में सबसे पहले इस फैशन  की इस राजधानी को देख लेने की ... [read more]
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१०. मकर राशि के सूर्य
मकर राषि के सूर्य आज तो लगते हैं लडडू गुड़-तिल के [read more]
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कुछ तो जुस्तजू अभी बाकी है………………
तुम लिखते नही या मुझ तक पहुंचते नही तुम्हारे वो खत जिसकी भाषा ,लिपि और व्याकरण सब मुझ पर आकर सिमट जाता है शायद संदेशवाहक बदल गये हैं या कबूतर अब तुम्हारी मुंडेर पर नही बैठते या शायद तुमने दाना डालना बंद कर दिया है तभी बहेलियों क ... [read more]
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सिँह लग्न और समस्या निवारक उपाय
जीवन में भरपूर सुख और सफलता की प्राप्ति हर मनुष्य का एक सपना होता है। लेकिन सुख-दुख, गम-खुशी, अमीरी-गरीबी तथा रोग एवं स्वास्थ्य आदि कालचक्र के ऎसे धुरे हैं, जो जीवन के चलने के साथ-साथ ही चलते हैं. दुनिया में हर इन्सान किसी न किसी समस्या ... [read more]
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"ज़ज़्बात जब पिघलते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
दिल-ए-ज़ज़्बात जब पिघलते हैं शब्द तब शायरी में ढलते हैं [read more]
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वो न आए उनकी याद वफ़ा कर गई ...
वो न आए उनकी याद वफ़ा कर गई, उनसे मिलने की चाह सुकून तबाह कर गई, आहट दरवाज़े की हुई तो उठकर देखा, मज़ाक हमसे हवा कर गई ! [read more]
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पूर्णता , अपूर्णता
कोई व्यक्ति कोई जगह कोई प्रश्न कोई हल .... पूर्ण है क्या ? किसी चित्रकार के चित्र में क्या सारी रेखाएं सही होती हैं ? क्या संस्कारों का एक ही परिणाम होता है ? जो तुम सोच रहे वही हर परिवेश की पृष्ठभूमि कैसे बन सकती है ? युगों स ... [read more]
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९. सूरज के ढाबे पर
सूरज के ढाबे पर फिर से दहकी है तंदूरी आग मौसम आज परोसे मक्के की रोटी सरसों का साग [read more]
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ऐसा ही बचा हुआ गाँव है
ऐसा ही बचा हुआ गाँव है श्यामनारायण मिश्र [read more]
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"सोने की चम्मच से खाने वाले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
(चित्र गूगल छवियों से साभार) चाँदी की थाली में, सोने की चम्मच से खाने वाले। महलों में रहने वाले करते, घोटालों पर घोटाले।। [read more]
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८. दिनकर तेरी ज्योत बढ़े
ज्यों दिन तिल-तिल बढ़ते जाते दिनकर तेरी ज्योत बढ़े [read more]
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माटी भी मोक्ष पा जाती है ...!!
कोमल  और कठोर ... [read more]
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प्रवृति
आज यूँ ही  छत पर डाल दिए थे  कुछ बाजरे के दाने  उन्हें देख  बहुत से कबूतर  आ गए थे खाने . खत्म हो गए दाने  तो टुकुर टुकुर  लगे ताकने  मैंने डाल दिए  फिर ढेर से दाने  कुछ दाने खा कर बाकी छोड़ कर   कबूतर उड़ गए  अपने ठिकाने . [read more]
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कई शरीर जिंदा होते हैं ! ...
साँसों के जिंदा होने का सुकून बहुत बड़ा होता है यूँ जीना तो बस एक मुहर है - वो भी नकली ! आत्महत्या आसान नहीं गुनाह भी है तो जबरदस्ती जीना - क्या गुनाह नहीं ? जाने कितने लोग गुनहगार बन कतरा कतरा साँसें ले रहे ... और इनायत यह कि प ... [read more]
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७. शीत से कँपती धरा
शीत से कँपती धरा की ओढ़नी है धूप कोहरे में छिप न पाये सूर्य का शुभ रूप [read more]
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तीन साल का लेखा जोखा (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
तीन साल का लेखा जोखा (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) [read more]
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देश की नाक
पिछले रविवार को भारत की क्रिकेट टीम आस्ट्रेलिया से तीसरा मैच भी बुरी तरह हार गयी . हार हमें बर्दाश्त नहीं . हमारे सारे हीरो जिन्हें हमने विश्व कप विजय के बाद आसमान पर बिठा रखा था , सभी अब जीरो हो गए . देश की सारी मिडिया का  पूरा का  पूर ... [read more]
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बंद दरवाजों का सच (समापन किस्त )
"नीलिमा..तुम मेरी बेटी जैसी हो....मैं तुम्हे बिलकुल ही गलत नहीं समझ रही....इन हालातो में ऐसा हो सकता है...मुझे ही देखो...आज पहला दिन है...बेटे -बहू का फोन भी आ चुका है..पति से भी बात हो चुकी है...पर इतना अकेलापन था....ये कुछ घंटे भी काट ... [read more]
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एक शाम की कहानी .......!!!!!!
जल्दी जल्दी घर का काम निपटा कर गुनगुनाते हुए अपनी अलमारी खोली .......मैचिंग पर्स ...मैचिंग  ज्वेलरी ....मैचिंग लिपस्टिक ...बड़े मन से सखियों से मिलने की तयारी होने लगी |आज बहुत दिनों बाद महिला मंडल की मीटिंग में जाना था |कुछ जोश ही अलग ... [read more]
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अब तो नदी के सूखने की संभावना ही नहीं है: महफूज़ (Mahfooz)
मुझे पता नहीं क्यूँ कविता करने से बहुत डर लगता है..... एक तो यह कि कोई पढ़ता नहीं है और जो पढ़ भी लेता है तो वो अपना दिमाग लगा कर उसके मतलब में अपने हिसाब से एनालिसिस कर उस कविता को तहस नहस कर देता है और फ़िर ऊपर से मेरे जैसे को हिंदी ड ... [read more]
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सर्द मौसम ( हाईकू)
घना कोहरा  [read more]
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"घूम रहे शैतान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सज्जनता का ओढ़ लबादा, घूम रहे शैतान! संकट में है हिन्दुस्तान! संकट में है हिन्दुस्तान!! [read more]
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स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया
आज एक ख्याल ने जन्म लिया स्त्री मुक्ति को नया अर्थ दिया [read more]
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६. साँसों की वीणा
उषा की अरुणिमा में ऊँचाई माप रहे संध्या की लाली में गहराई झाँक रहे जीवन भर सूरज सा जलते ही जाना है [read more]
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"मिलने आना तुम बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
पापा की लग गई नौकरी, देहरादून नगर बाबा। कैसे भूलें प्यार आपका, नहीं सूझता कुछ बाबा।। [read more]
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बंद दरवाजों का सच (समापन किस्त )
"नीलिमा..तुम मेरी बेटी जैसी हो....मैं तुम्हे बिलकुल ही गलत नहीं समझ रही....इन हालातो में ऐसा हो सकता है...मुझे ही देखो...आज पहला दिन है...बेटे -बहू का फोन भी आ चुका है..पति से भी बात हो चुकी है...पर इतना अकेलापन था....ये कुछ घंटे भी काट ... [read more]
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"मौसम के हैं ढंग निराले" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
श्वेत कुहासा-बादल काले। मौसम के हैं ढंग निराले।। [read more]
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नींद उसकी ख़्वाब उसके ज़िक्र उसका हर घड़ी
सिराज फैसल खान की ग़ज़लें  [read more]
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अपनी उम्र को तो शायद तूने तिजोरी में बंद कर रखा है ...........
ये कैसा चलन आया ज़माने का सुनता है घुटती हुई चीखें  [read more]
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५, गूँगा सूरज
चलते-चलते गूंगा सूरज क्षण भर तल्ख़ तल्ख़ शब्दों में जाने क्या क्या आज लिख गया श्यामपट्ट पर शाम ढले। [read more]
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मैं और मेरा ही मैं ...
" तुम थकती नहीं ? तूफ़ान के मध्य भी कैसे खा लेती हो ? कैसे हँस लेती हो ? कैसे औरों के लिए सोच लेती हो ? " ..... पूछता था मेरा ही मैं मुझसे ! [read more]
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लो फिर आई है चिड़िया ........!!
भोर से पहले ही उठ जाती सूखे सूखे त्रिण चुन लाती बुलबुल सी उड़-उड़ ... रे मन चुलबुल ... बाग़ में चहचहाई  है चिड़िया मन भाई है चिड़िया ..!! लो ,फिर आई है चिड़िया.... [read more]
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"रिवाज़-रीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
फूल हो गये ज़ुदा, शूल मीत बन गये। भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।। [read more]
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४. किरणों की अगाध नदी
धरती कभी न छोड़े चलना सूरज कभी न जलना [read more]
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माध्यम बनी क्या आज नारी ....?
कुटिल            नीतिज्ञों                के   हृदय            कितने       मलिन    हैं  स्वयं        हैं           षड्यंत्र       रचते  फांसते        निरी         नार          हैं. [read more]
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स्मृति शिखर से… 3 : गोली बंदूक कुछ नहीं समझता है।
- करण समस्तीपुरी "छौंरी पतरकी गे........ गोरिया खेतबा के आरी.... काहे मारे गजब पिहकारी.... !!" गौर-वर्ण, सुपुष्ट शरीर, जटा-जुटित मस्तक, हाथ मे डिबिया लिए, तुतली आवाज में यही गीत गाते घर से बथान पर जाते हुए जटा झा के प्रति पता नहीं कैसे ... [read more]
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कर्क लग्न और समस्या निवारक उपाय
जीवन में भरपूर सुख और सफलता की प्राप्ति हर मनुष्य का एक सपना होता है। लेकिन सुख-दुख, गम-खुशी, अमीरी-गरीबी तथा रोग एवं स्वास्थ्य आदि कालचक्र के ऎसे धुरे हैं, जो जीवन के चलने के साथ-साथ ही चलते हैं. दुनिया में हर इन्सान किसी न किसी समस्या ... [read more]
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बंद दरवाजों का सच
(काफी दिनों बाद कहानी पोस्ट कर रही हूँ....पर साथ में इसे दूसरे ब्लॉग 'अपनी-उनकी-सबकी बातें' पर भी पोस्ट करनी पड़ रही है वरना वहाँ मैं अन्य विषयों पर लिखना शुरू कर देती हूँ और कहानियों की बारी आती ही नहीं. यहाँ कमेन्ट ऑप्शन बंद कर दे रही ... [read more]
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अहम या इमानदारी ...
जबकि मुझे लगता है हमारी मंजिल एक थी मैं आज भी नही जान सका क्यों हमारा संवाद वाद विवाद की सीमाएं लांघ कर मौन में तब्दील हो गया [read more]
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"फेसबुक और गूगल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
ग्राह्य है सुगन्ध त्याज्य है दुर्गन्ध इसीलिए न्यायपालिका ने लिया है संज्ञान फेसबुक और गूगल को देना होगा ध्यान हटाना होगा अश्लील सामान सावधान! सावधान!! बन्द करना होगा ऐसे लोगों का पिटारा जो प्रदूषित कर रहे हैं गंगा की धारा ... [read more]
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मुझे उस एक रोज की तलाश है.............
काश ऐसा एक रोज़ हर किसी की ज़िन्दगी मे आये [read more]
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ठहरे हुए वक़्त ...
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३. नभ में उमंगें !
लहराईं नभ में उमंगें उमंगें पतंगें पतंगें पतंगें पतंगें ! [read more]
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बंद दरवाजों का सच
(दस जनवरी को मेरे इस ब्लॉग के दो साल हो गए. जैसा कि मैने पहले भी जिक्र किया है...ये मेरा दूसरा ब्लॉग है, 'मन का पाखी ' ब्लॉग पर सिर्फ कहानियां ही पोस्ट करती हूँ....और कहानियों से इतर जो कुछ भी दिमाग में हलचल मचाये उसे इस ब्लॉग पर उंडेल ... [read more]
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❀अर्पित ‘सुमन’❀